अपने पति के द्वारा मेरा बलात्कार करवाया वो भी अपने नजरों के सामने ये कहना है पीड़िता गुलाबो देवी का। वह रो-रोकर अपनी अस्मत लूटने की व्यथा कह रही थी। हैवानियत की हद को पार करने वाली कोई और नहीं एक औरत है। मानवता को शर्मसार कर देनेवाली यह घटना है सीतामढ़ी की। जहां की गुलाबो देवी नाम की एक महिला ने अपने ससुराल वालों से इंसाफ की चाह में वहां की जिला प्रकोष्ठ की अध्यक्ष किरण गुप्ता से सुरक्षा और बिखरते वैवाहिक जीवन को बचाने की गुहार लगाने पहुंची क्योंकि पुलिस थाने में जब उसने शिकायत दर्ज करवायी तो पुलिस ने कहा तुम किरण गुप्ता के पास जाओ वो तुम्हारी मदद करेगी। पीड़िता जदयू नैत्री के पास जाती है शुरू-शुरू में उसे इंसाफ दिलाने की दलिलें देती हुई उसके पति से फोन पर बात भी कराती है। इसी बहाने अपने घर के सारे काम भी कराती है। यूहीं गुलाबो कई बार किरण गुप्ता के घर जाती रहती है। पीड़िता के अनुसार जब वह किरण गुप्ता के घर जाती उसके यहां लोगों की भीड़ लगी रहती। प्राप्त जानकारी के अनुसार गुलाबो देवी के ससुराल वाले उसके साथ खूब मारपीट किया करते थे और उसका गर्भपात भी करवाया दिया था। कुछ दिन से पति को भी उससे मिलने नहीं दे रहे थे। इसी से तंग आकर गुलाबो ने मदद की गुहार नेत्री किरण गुप्ता से मदद की गुहार लगायी लेकिन बुधवार को समय ने उसके साथ एक और खेल खेला, उसे क्या पता था कि जिससे मदद की गुहार लगाने गयी है वही उसके इज्जत को तार-तार कर देंगे। जब वह घर में काम कर रही थी उसी समय किरण गुप्ता का पति आ जाता है किरण गुप्ता अपने पति को घर के खिड़की-दरवाजे बंद करने को कहती है और गुलाबो के हाथ-पैर बांधकर अपने पति से बलात्कार करवाया। यह पूरा वाक्या एक औरत के प्रति घिनौनी वारदात को अंजाम देने जैसा है। हमारे समाज में ऐसी लाखों गुलाबो हैं जो अपने ही मां-बहन के द्वारा बाजार में बेरहमी से बेची जा रही है। और सारे कानून मूकदर्शक बनकर देख रही है। मानवता के हत्यारे खुला सांड़ की तरह घुम रहे हैं लेकिन, हर कोई गुलाबो नहीं हो सकती जो अपने ही चिरहरण की कहानी बताने और इंसाफ पाने की हिम्मत रखती है। यह घटना अपने पीछे कई सवाल छोड़ गया है जैसे-जैसे परदा उठेगा कई गड़े मुर्दे बाहर आते जाएंगे और औरत के प्रति हैवानियत की सच्चाई सबके सामने आएगी। यह ज्यादा अहमियत नहीं रखता है कि हैवानित की हद पार वाली सत्ता दल की नेत्री है बल्कि यह अहमियत रखता है वो एक औरत है।
Thursday, December 15, 2011
Saturday, October 15, 2011
बस सह रही है और इज्ज़त ढो रही
कोई कैसे सहता है इतना दर्द। केवल अपने माता-पिता की इज्ज़त के लिए। औरतो के किस्मत की ऐ कैसी विद्बंवना है। जिस परिवार के लिए अपनी इच्छाए मारकर आतीं है। वहां उसे जिल्लत की जिन्दगी मिलती है। मै ऐ नहीं कहती सभी औरतो के साथ के साथ होता है। लेकिन भारत जैसे देश में ऐसा होते देख दिल दहल जाता है। यहा स्त्री को तो देवी माना जाता जाता है। फिर ऐसा क्यों है। मेरे घर के एक पिछले दस सालो से अपने पागल पति से रोज़ पिटती है।
केवल इस डर से की यहाँ से वह कहाँ जाएगी। एक तो गरीबी , उसपर उसका सुन्दर होना ही जी का जंजाल है। देखते- देखते दस साल बीत गए है तिन बच्चो की माँ बन गई है। मगर अह कोई नहीं जनता जानवरों की तरह पिट-पिट कर उसके शारीर की क्या स्थिति है। बस सह रही है और इज्ज़त ढो रही
केवल इस डर से की यहाँ से वह कहाँ जाएगी। एक तो गरीबी , उसपर उसका सुन्दर होना ही जी का जंजाल है। देखते- देखते दस साल बीत गए है तिन बच्चो की माँ बन गई है। मगर अह कोई नहीं जनता जानवरों की तरह पिट-पिट कर उसके शारीर की क्या स्थिति है। बस सह रही है और इज्ज़त ढो रही
Saturday, March 5, 2011
साहित्यिक बातों को कितनी जगह
अखबार के पते पर आने वाले पत्रों में कविता, कहानी लेख की संख्या अन्य प्रकार के पत्रों की संख्या से मुकाबले दोगुनी या तीगुनी होती है। कविता कहानी और लेख को रोज इकट्ठा किया जाए तो कोई भी अखबार महीने में एक से दो पुस्तकें जरूर प्रकाशित कर सकता है। अखबारों के व्यावसायकि होने के कारण खबरें पहले से ही संकुचित हो चुकी है इस परिस्थिति कविता, लेख और कहानियां कहां से सांस ले पायेगी। इस देश ने पूरी दुनियां को एक से बढ़कर एक साहित्कार, कथाकार दिये हैं। लेकिन दुख की बात है इस देश के एक प्रतिष्ठित समाजपत्र ने लोकल फीचर डेस्क को खत्म कर दिया है। साहित्य सदा से हमारे समाज का आईना रहा है। इन्हीं कविता, कहानी और नारों के दम पर हमारे महापुरुषों ने अंग्रेजों के नाक में दम किया था। लेकिन आज दिनों-दिन जिसप्रकार महंगाई बढ़ती जा रही है बिना पैसे के एक कदम भी बढ़ना जहां मुश्किल है वहीं कम पैसे में कहानी , कविता और लेख कैसे सांस ले पायेगी। यह बात सच है कि साहित्य के प्रति आज भी लोगों में वही रुचि है जो पहले हुआ करती थी। इस कारण लोगों में इन अखबारों में इनका डिमांड भी अधिक होता है। लेकिन क्या केवल अखबार बिकने से अखबार मालिक अपना व्यवसाय चला पायेंगे। आज एक अच्छे पत्रकार का वेतन 25-30 हजार है ऐसे में अखबार इन साहित्यिक बातों को कितना जगह दे पायेगा। ये आप बेहतर सोच सकते हैं। जो व्यक्ति कविता, लेख और पुस्तक समीक्षा करके अपनी जेब खर्च निकालते हैं।
Saturday, February 12, 2011
प्रवृत्तियां

वाह रे मनुष्य वाह रे तेरी प्रवृत्तियां
दुख में भी खुश होकर जीना चाहता है।
मृत्यु की सईयां पर लेटकर,
जीवन का एक क्षण जीना चाहता है।
हर पल लड़ता है अपने दुखों से,
फिर भी हंसकर सबको दिखाना चाहता है।
वाह रे मनुष्य, वाह रे तेरी प्रवृत्तियां
कर्म की कमी नहीं,
पर बैठकर खाने का आनंद उठाना चाहता है।
चाहे धन कितना अर्जित कर ले,
पर धन का लोभ नहीं छोड़ना चाहता है।
अपनो ंकी कमी नहीं,
फिर भी दूसरों में अपनों को ढूढ़ना चाहता है।
वाह रे मनुष्य, वाह रे तेरी प्रवृत्तियां
ढूंढों तो सुन्दरता की कमी नहीं,
पर सुन्दर बनने का ढोंग रचाना चाहता है।
राम के नाम को गाली देकर,
राम नाम जपना चाहता है।
बेटा-बेटी एक समान है
पर बेटा से अपना अंतिम संस्कार चाहता है।
वाह रे मनुष्य, वाह रे प्रवृत्तियां
भूल
कभी जिंदगी कभी किताब है,
इस भूल का अलग ही शबाब है।
चैन लेकर बेचैनी देती है,
कभी अनछुआ एहसास बनकर मन को हंसाती है।
जागे-जागे आंखों मेंअनदेखा ख्याव है
कभी जिन्दगी कभी किताब है,
इस भूल का अलग ही शबाब है।
जितना पवित्र, उतना ही निर्मल
इसका तो हर रूप निराला है।
रातों को सितारे बनकर मन को जगमगाति है
दिन में सच बनकर सामने आती है।
बिन पीये जो नशा ला दे ये ऐसा शराब है।
कभी जिन्दगी, कभी किताब है।
इस भूल का अलग ही शबाब है।
फूलों से नाजूक रिश्ता है यह
बिन छुये ही टूट जाये
कभी जन्म-जन्म का बंधन
बनकर जीवन भर साथ निभाये
प्रेम पर मर-मिटने को हर पल बेताब है।
कभी जिन्दगी, कभी किताब है,
इस भूल का अलग ही शबाब है।
इस भूल का अलग ही शबाब है।
चैन लेकर बेचैनी देती है,
कभी अनछुआ एहसास बनकर मन को हंसाती है।
जागे-जागे आंखों मेंअनदेखा ख्याव है
कभी जिन्दगी कभी किताब है,
इस भूल का अलग ही शबाब है।
जितना पवित्र, उतना ही निर्मल
इसका तो हर रूप निराला है।
रातों को सितारे बनकर मन को जगमगाति है
दिन में सच बनकर सामने आती है।
बिन पीये जो नशा ला दे ये ऐसा शराब है।
कभी जिन्दगी, कभी किताब है।
इस भूल का अलग ही शबाब है।
फूलों से नाजूक रिश्ता है यह
बिन छुये ही टूट जाये
कभी जन्म-जन्म का बंधन
बनकर जीवन भर साथ निभाये
प्रेम पर मर-मिटने को हर पल बेताब है।
कभी जिन्दगी, कभी किताब है,
इस भूल का अलग ही शबाब है।
Thursday, February 10, 2011
ये कैसी पूजा
पल-पल न माने है टिंकू जिया इश्क का मंजन घिसे है पिया। इस गानों ने सरस्वती पूजा के अवसर पर लगभग पूरे पंडाल पर धमाल मचाया। पूजा पर मां गाने का तो नामों निशान पता नहीं चल रहा था। दुर्गा पूजा हो या सरस्वती पूजा नौजवानों इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। लेकिन मां के प्रति ये कैसी श्रद्धा है जो इन नौजवानों को शराब की बोतलों में रमकर खून-खराबे में खत्म होती है। पंडाल सजाने से लेकर मूर्ति सजाने और पूजा पाठ तक मां के भक्ति में लीन इन युवाओं को देखकर ऐसा लगता ही नही है विद्या और शक्ति के पुजारी मां के अंतिम विदाई पर शराब के नशे में धुत्त होकर लड़कियों के साथ कैसे छेड़खानी शुरू कर देते हैं। और ऑस्केस्ट्रा में नचानेवालियों के साथ अश्लील गानों नी मर्यादा के सारी हदे तोड़ डालते हैं। मूर्ति विसर्जन को जाते इन युवाओं को जब हमने अश्लील गानों पर नाचनेवाली के साथ अभद्र व्यवहार करते देखा तो सिर शर्म से झुक गया, लगा जिस देश में लड़की को साक्षात मां का रूप माना गया है उसे सरेआम युवाओं द्वारा बेइज्जत किया जा रहा है। यह कैसी अस्मिता है। सरस्वती विसर्जन के लिए जाते-जाते इन्हें न जाने क्या हो जाता है। शराब की बोतले खुलनी शुरू हो जाती है। मजाक-मजाक की बात पर लड़ने-झगने को आतुर हो जाते हैं स्थिति मार-पीट से खून-खराबे में बदल जाती है। ऐसी घटना का गवाह हर साल मां दुर्गा और सरस्वती मां बनता रहा है।
कई लोगों की जानें भी गई है। ये युवा कब अपने मार्ग से भटक से जाते हैं। किसी को पता भी नहीं चलता है। जो मां की अस्मिता को तार-तार कर देता है।
कई लोगों की जानें भी गई है। ये युवा कब अपने मार्ग से भटक से जाते हैं। किसी को पता भी नहीं चलता है। जो मां की अस्मिता को तार-तार कर देता है।
Tuesday, February 8, 2011
मां और वसंत पंचमी

वंसत पंचमी के दिन मां सरस्वती की पूजा पूरे श्रद्धा-भाव से किया गया। इस दिन विद्यार्थी और संगीत साधक का मां के प्रति साधना ने यह साबित कर दिया है कि आज के वैज्ञानिक युग में भी सरस्वती पूजन का कितना महत्व है। सरस्वती पूजा के पहले ही बच्चे इसकी तैयारी में लग जाते हैं। ऐसा माना जाता है भारतीय सभ्यता-संस्कृति में वसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती को गुलाल चढ़ाया जाता है और इसके साथ ही होली पर्व की शुरूआत हो जाती है। विद्या की देवी मां सरस्वती ने वसंत पंचमी को सचमुच महान बना दिया है।
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